मंत शर्मा को केंद्र सरकार की मिलीभगत की जानकारी काँग्रेस के नेताओं से
ही मिल रही थी. उन्होंने लिखा है, "उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरबहादुर
सिंह ने मुझे ख़ुद बताया कि दिल्ली से सीधे आदेश आ रहे थे और कमिश्नर से
सीधे कहा जा रहा था कि इस बात के सभी उपाय किए जाएँ कि ताला खोलने की
अर्ज़ी मंज़ूर हो."
हेमंत लिखते हैं, "यह धारणा ग़लत है कि राम जन्मस्थान को लेकर बीजेपी या जनसंघ ने ही लड़ाइयाँ लड़ीं या मंदिर निर्माण के लिए सिर्फ़ उनकी ही प्रतिबद्धता रही. मेरा निष्कर्ष है कि इस पूरे विवाद और आंदोलन के पीछे काँग्रेस मज़बूती से रही. काँग्रेस की नीति आज़ादी के बाद से ही मंदिर समर्थक की रही. 6 दिसंबर, 1992 के ध्वंस के लिए बीजेपी से कहीं ज़्यादा केंद्र की कांग्रेस सरकार ज़िम्मेदार है."
किताब में दर्ज किए गए इन तथ्यों से क़तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि जब बाबरी मस्जिद के भीतर चुपचाप और चालाकी से मूर्तियाँ रख दी गईं, उस वक़्त गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. और उन्होंने बाद में इन मूर्तियों को हटाने की हिम्मत नहीं की.
इमारत का ताला जब खुला तब राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री थे. फिर 1989 में उनकी ही सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करवाया और चुनाव प्रचार अयोध्या से शुरू करते हुए रामराज्य का वादा किया.
इन घटनाओं को लेखिका अरुंधति रॉय के बयान की रोशनी में देखेंगे तो पूरा अयोध्या विवाद भारतीय जनता पार्टी और काँग्रेस के बीच छायायुद्ध नज़र आएगा.
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बाबरी मस्जिद को ढहाकर वहाँ अस्थायी मंदिर बनाने की बुनियाद ही छल के आधार पर डाली गई. छल का ये खेल उससे भी बहुत पहले से ही चला आ रहा था.
किसने किसको छला? क्या विश्व हिंदू परिषद ने प्रधानमंत्री नरसिंह राव को छला? या नरसिंह राव बाबरी मस्जिद को ध्वस्त होता देख बीजेपी को छल रहे थे? क्या आरएसएस ने कल्याण सिंह को छला जो 6 दिसंबर की सुबह इस बात पर हतप्रभ थे कि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की योजना उन्हें क्यों नहीं बताई गई? क्या कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद को नुक़सान न पहुँचने का हलफ़नामा देकर न्यायपालिका को छला? क्या नरसिंह राव छिपे हुए हिंदुत्ववादी थे जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को छला? क्या कारसेवकों ने अपने मातृसंगठन आरएसएस को छला और बिना किसी योजना के बाबरी मस्जिद तोड़ डाली? या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने छल-कपट की बुनियाद पर हिंदुओं को आंदोलित किया और पूरे देश कोअपने प्रिय स्वयंसेवक लालकृष्ण आडवाणी के ज़रिए सांप्रदायिक उन्माद की आग में झोंक दिया?
हेमंत शर्मा ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद जनसत्ता अख़बार में साफ़-साफ़ लिखा कि मस्जिद ढहाने की साज़िश रची गई थी. पर 25 बरस बाद तमाम लोगों से बात करने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि मस्जिद तोड़ने की कोई साज़िश नहीं रची गई थी. ये अलग बात है कि लालकृष्ण आडवाणी से लेकर उमा भारती तक बीजेपी के कई नेता अब भी इस साज़िश के मुकदमे में अभियुक्त हैं और अदालत ने अभी इनमें से किसी को बरी नहीं किया है.
जब आँखों के सामने बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो रिपोर्टर को लगा कि ये काम बिना गहरी साज़िश के नहीं हो सकता. पर ढाई दशक बाद उसी रिपोर्टर के कथित षडयंत्रकारियों के तर्क से सहमत होना एक दिलचस्प बात है.
इनमें से कोई भी व्यक्ति, संगठन या संस्था सवालों से परे नहीं हैं. हेमंत शर्मा ने सवाल विश्व हिंदू परिषद पर भी उठाए हैं पर उस तुर्शी के साथ नहीं जिस तुर्शी के साथ उन्होंने काँग्रेसी नेताओं को नेज़े की नोक पर लिया है.
उन्होंने लिखा है, "कारसेवकों को वही करने के लिए बुलाया गया, जो उन्होंने किया. 'ढाँचे पर विजय पाने' और 'ग़ुलामी के प्रतीक को मिटाने' के लिए ही तो वे यहाँ लाए गए थे. दो सौ से दो हज़ार किलोमीटर दूर से जिन कारसेवकों को इस नारे के साथ यहाँ लाया गया था कि 'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो.' उन्हें आख़िरकार यही तो करना था. वे कोई भजन कीर्तन करने नहीं आए थे. … ढाई लाख कारसेवक अयोध्या में जमा थे. नफ़रत, उन्माद और जुनून से लैस. उन्हें जो ट्रेनिंग दी गई थी या जिस हिंसक भाषा में समझाया गया था, उसके चलते अब उन्हें पीछे हटने को कैसे कहा जा सकता था?"
पर कार सेवकों को हिंसक भाषा में समझाने वाला कौन था? उनके सिर पर रक्तरंजित जुनून पैदा करने वाले कौन नेता थे? कौन थे वो लोग जो लगातार कहते रहे, बल्कि आज भी धमकाते हुए पूछते हैं: "अगर न्याय नहीं मिलेगा तो अयोध्या में महाभारत होगा. हिंसा को कौन रोक सकेगा?" किताब में इन सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है पर पूरी ज़िम्मेदारी फ़ैसला करने में ढीली न्यायपालिका और काँग्रेसी नेताओं की अवसरवादिता पर डाल दी गई है.
पर इस सवाल का जवाब ढूँढा जाना अभी बाक़ी है कि वो काला बंदर कौन है जो इतने बरसों से भारतीय राजनीति को अपनी धुन पर नचाता आ रहा है?
हेमंत लिखते हैं, "यह धारणा ग़लत है कि राम जन्मस्थान को लेकर बीजेपी या जनसंघ ने ही लड़ाइयाँ लड़ीं या मंदिर निर्माण के लिए सिर्फ़ उनकी ही प्रतिबद्धता रही. मेरा निष्कर्ष है कि इस पूरे विवाद और आंदोलन के पीछे काँग्रेस मज़बूती से रही. काँग्रेस की नीति आज़ादी के बाद से ही मंदिर समर्थक की रही. 6 दिसंबर, 1992 के ध्वंस के लिए बीजेपी से कहीं ज़्यादा केंद्र की कांग्रेस सरकार ज़िम्मेदार है."
किताब में दर्ज किए गए इन तथ्यों से क़तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि जब बाबरी मस्जिद के भीतर चुपचाप और चालाकी से मूर्तियाँ रख दी गईं, उस वक़्त गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. और उन्होंने बाद में इन मूर्तियों को हटाने की हिम्मत नहीं की.
इमारत का ताला जब खुला तब राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री थे. फिर 1989 में उनकी ही सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करवाया और चुनाव प्रचार अयोध्या से शुरू करते हुए रामराज्य का वादा किया.
इन घटनाओं को लेखिका अरुंधति रॉय के बयान की रोशनी में देखेंगे तो पूरा अयोध्या विवाद भारतीय जनता पार्टी और काँग्रेस के बीच छायायुद्ध नज़र आएगा.
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बाबरी मस्जिद को ढहाकर वहाँ अस्थायी मंदिर बनाने की बुनियाद ही छल के आधार पर डाली गई. छल का ये खेल उससे भी बहुत पहले से ही चला आ रहा था.
किसने किसको छला? क्या विश्व हिंदू परिषद ने प्रधानमंत्री नरसिंह राव को छला? या नरसिंह राव बाबरी मस्जिद को ध्वस्त होता देख बीजेपी को छल रहे थे? क्या आरएसएस ने कल्याण सिंह को छला जो 6 दिसंबर की सुबह इस बात पर हतप्रभ थे कि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की योजना उन्हें क्यों नहीं बताई गई? क्या कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद को नुक़सान न पहुँचने का हलफ़नामा देकर न्यायपालिका को छला? क्या नरसिंह राव छिपे हुए हिंदुत्ववादी थे जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को छला? क्या कारसेवकों ने अपने मातृसंगठन आरएसएस को छला और बिना किसी योजना के बाबरी मस्जिद तोड़ डाली? या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने छल-कपट की बुनियाद पर हिंदुओं को आंदोलित किया और पूरे देश कोअपने प्रिय स्वयंसेवक लालकृष्ण आडवाणी के ज़रिए सांप्रदायिक उन्माद की आग में झोंक दिया?
हेमंत शर्मा ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद जनसत्ता अख़बार में साफ़-साफ़ लिखा कि मस्जिद ढहाने की साज़िश रची गई थी. पर 25 बरस बाद तमाम लोगों से बात करने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि मस्जिद तोड़ने की कोई साज़िश नहीं रची गई थी. ये अलग बात है कि लालकृष्ण आडवाणी से लेकर उमा भारती तक बीजेपी के कई नेता अब भी इस साज़िश के मुकदमे में अभियुक्त हैं और अदालत ने अभी इनमें से किसी को बरी नहीं किया है.
जब आँखों के सामने बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो रिपोर्टर को लगा कि ये काम बिना गहरी साज़िश के नहीं हो सकता. पर ढाई दशक बाद उसी रिपोर्टर के कथित षडयंत्रकारियों के तर्क से सहमत होना एक दिलचस्प बात है.
इनमें से कोई भी व्यक्ति, संगठन या संस्था सवालों से परे नहीं हैं. हेमंत शर्मा ने सवाल विश्व हिंदू परिषद पर भी उठाए हैं पर उस तुर्शी के साथ नहीं जिस तुर्शी के साथ उन्होंने काँग्रेसी नेताओं को नेज़े की नोक पर लिया है.
उन्होंने लिखा है, "कारसेवकों को वही करने के लिए बुलाया गया, जो उन्होंने किया. 'ढाँचे पर विजय पाने' और 'ग़ुलामी के प्रतीक को मिटाने' के लिए ही तो वे यहाँ लाए गए थे. दो सौ से दो हज़ार किलोमीटर दूर से जिन कारसेवकों को इस नारे के साथ यहाँ लाया गया था कि 'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो.' उन्हें आख़िरकार यही तो करना था. वे कोई भजन कीर्तन करने नहीं आए थे. … ढाई लाख कारसेवक अयोध्या में जमा थे. नफ़रत, उन्माद और जुनून से लैस. उन्हें जो ट्रेनिंग दी गई थी या जिस हिंसक भाषा में समझाया गया था, उसके चलते अब उन्हें पीछे हटने को कैसे कहा जा सकता था?"
पर कार सेवकों को हिंसक भाषा में समझाने वाला कौन था? उनके सिर पर रक्तरंजित जुनून पैदा करने वाले कौन नेता थे? कौन थे वो लोग जो लगातार कहते रहे, बल्कि आज भी धमकाते हुए पूछते हैं: "अगर न्याय नहीं मिलेगा तो अयोध्या में महाभारत होगा. हिंसा को कौन रोक सकेगा?" किताब में इन सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है पर पूरी ज़िम्मेदारी फ़ैसला करने में ढीली न्यायपालिका और काँग्रेसी नेताओं की अवसरवादिता पर डाल दी गई है.
पर इस सवाल का जवाब ढूँढा जाना अभी बाक़ी है कि वो काला बंदर कौन है जो इतने बरसों से भारतीय राजनीति को अपनी धुन पर नचाता आ रहा है?
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